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जानिये उत्तराखंड के प्राचीन प्रमुख देवस्थालो में प्रसिद्ध तीर्थ स्थान “ जागेश्वर धाम ”

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जानिये उत्तराखंड के प्राचीन प्रमुख देवस्थालो में प्रसिद्ध तीर्थ स्थान “ जागेश्वर धाम ”


जागेश्वर धाम

उत्तराखंड के प्रमुख देवस्थालो में “जागेश्वर धाम या मंदिर” एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। यह उत्तराखंड का सबसे बड़ा मंदिर समूह है।यह कुमाउं मंडल के अल्मोड़ा जिले से 38 किलोमीटर की दुरी पर देवदार के जंगलो के बीच में स्थित है।जागेश्वर को उत्तराखंड का “पाँचवा धाम” भी कहा जाता है। जागेश्वर मंदिर में 125 मंदिरों का समूह है। जिसमे 4-5 मंदिर प्रमुख है जिनमे विधि के अनुसार पूजा होती है।जागेश्वर धाम मे सारे मंदिर समूह केदारनाथ शैली से निर्मित हैं।जागेश्वर अपनी वास्तुकला के लिए काफी विख्यात है।बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित ये विशाल मंदिर बहुत ही सुन्दर हैं। जागेश्वर मंदिर में लगभग 25 मंदिर अपनी भव्यता के साथ-साथ पुरातत्व कला की दृष्टि से भी प्रसिद्ध हैं। प्राचीन मान्यता के अनुसार जागेश्वर धाम भगवान शिव की तपस्थली है।यहाँ नव दुर्गा ,सूर्य, हमुमान जी, कालिका, कालेश्वर प्रमुख हैं।हर वर्ष श्रावण मास में पूरे महीने जागेश्वर धाम में पर्व चलता है । पूरे देश से श्रद्धालु इस धाम के दर्शन के लिए आते है | इस स्थान में कर्मकांड, जप, पार्थिव पूजन आदि चलता है।मंदिर में विदेशी पर्यटक भी खूब आते हैं। जागेश्वर मंदिर में हिन्दुओं के सभी बड़े देवी-देवताओं के मंदिर हैं।दो मंदिर विशेष हैं पहला “शिव” और दूसरा शिव के “महामृत्युंजय रूप” का।8 वी ओर 10 वी शताब्दी मे निर्मित इस मंदिर समूहों का निर्माण कत्यूरी राजाओ ने करवाया था परन्तु लोग मानते हैं कि मंदिर को पांडवों ने बनवाया था , लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि इन्हें कत्यूरी और चंद शासकों ने बनवाया था । इस स्थल के मुख्य मंदिरों में दन्देश्वर मंदिर, चंडी-का-मंदिर, कुबेर मंदिर, मिर्त्युजय मंदिर , नौ दुर्गा, नवा-गिरह मंदिर, एक पिरामिड मंदिर और सूर्य मंदिर शामिल हैं।महामंडल मंदिर,महादेव मंदिर का सबसे बड़ा मंदिर है, जबकि दन्देश्वर मंदिर जागेश्वर का सबसे बड़ा मंदिर है। किवंदती के अनुसार भगवान शिव इसी स्थान में ध्यान करने आये थे।यह बात जानने के बाद सभी गाँव की महिलाये भगवान शिव जी की एक झलक पाने के लिए इकठठे हुए और जब गाँव के सारे पुरुष सदस्यों को यह बात पता चली , तो सारे पुरुष क्रोधित हो गए और सभी पुरुष उस तपस्वी को खोजने लगे जिसने महिलाओ को मोहित किया था। इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भगवान शिव ने एक बच्चे का रूप लिया और तब से इस स्थान में भगवान शिव की पूजा “बाल जागेश्वर” के रूप में की जाती है।मंदिर में अन्दर शिवलिंग दो भागो में उपस्थित है , जहाँ आधा बड़ा हिस्सा भगवान शिव का प्रतीक है , वही छोटा हिस्सा उनकी पत्नी पार्वती का प्रतिनिधित्व करता है। अन्य मान्यता यह है कि शिव का महामृत्युंजय रूप भारत में केवल “जागेश्वर” में ही उपस्थित है। जागेश्वर की हरी-भरी घाटी में नन्दनी और सुरभि नामक दो छोटी-छोटी नदियाँ हैं। जिसे बाद में “जटा गंगा” कहते हैं और यहाँ एक कुण्ड भी है , जिसमें श्रद्धालु स्नान करने के बाद मंदिर में पूजा करने जाते हैं । मंदिर के नीचे शमशान घाट है , जहाँ शवदाह करना बड़ा पवित्र माना जाता है।


जागेश्वर मंदिरों के शिखर

जागेश्वर धाम मंदिर परिसर में 125 मंदिर हैं जो भगवान् शिव को उनके लिंग रूप में समर्पित हैं। हालांकि प्रत्येक मन्दिर के भिन्न भिन्न नाम हैं। कुछ शिव के विभिन्न रूपों पर आधारित और कुछ समर्पित हैं नवग्रह जैसे ब्रह्मांडीय पिंडों पर। एक मंदिर शक्ति को समर्पित है जिसके भीतर देवी की सुन्दर मूर्ति है। एक मंदिर दक्षिणमुखी हनुमान तो एक मंदिर नवदुर्गा को भी समर्पित है।

अधिकतर मंदिरों के भीतर शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिरों के नामों पर आधारित शिलाखंड पट्टिकाएं मंदिरों के प्रवेशद्वारों पर लगाए गए है। जैसे कुबेर मंदिर के ऊपर कुबेर पट्टिका, लाकुलिश मंदिर के ऊपर लाकुलिश पट्टिका। इसी तरह तान्डेश्वर मन्दिर के प्रवेशद्वार के ऊपर लगी पट्टिका पर नृत्य करते शिव का शिल्प है।

जागेश्वर मंदिर परिसर के अधिकाशं मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली में निर्मित हैं जिस में मंदिर संरचना में उसके ऊंचे शिखर को प्रधानता दी जाती है। इसके अलावा बड़े मंदिरों में शिखर के ऊपर लकड़ी की छत भी अलग से लगाई जाती है। यह यहाँ की विशेषता दिखाई पड़ती है। स्थानीय भाषा में इसे बिजौरा कहा जाता है। यह मंदिरों पर नेपाली अथवा तिब्बती प्रभाव प्रतीत होता है। कुछ मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में भी बनें हैं।
कहा जाता है कि जागेश्वर मंदिर कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्राचीन मार्ग पर पड़ता है। जागेश्वर का जिक्र चीनी यात्री हुआन त्सांग ने भी अपनी यात्रा संस्मरण में किया है।

जागेश्वर धाम के उत्सव:

जागेश्वर मंदिर में भगवान् शिव से सम्बंधित दो मुख्य उत्सव मनाये जातें हैं। निःसंदेह एक है शिवरात्रि और दूसरा है श्रावण मास जो जुलाई से अगस्त के बीच पड़ता है।

जागेश्वर मंदिर – ८वां. ज्योतिर्लिंग अथवा नागेश ज्योतिर्लिंग
भारत में भगवान् शिव के पवित्र १२ ज्योतिर्लिंग हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह संस्कृत श्लोक गद्य में उन १२ ज्योतिर्लिंगों की व्याख्या करता है-

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् । उज्जयिन्यां महाकालमोकांरममलेश्वरम् ।
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम् । सेतुबंधे तु रामेशं नागेशं दारूकावने ।
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्रयंम्बकं गौतमीतटे । हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ।
ऐतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ।

हिन्दू धर्म को मानने वाले अपने जीवनकाल में इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन की अभिलाषा रखतें हैं। भौगोलिक दृष्टीकोण से देखा जाय तो इन १२ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन आपको भारत के चारों कोनों के भ्रमण करा देते हैं। यह १२ ज्योतिर्लिंग देश के विभिन्न क्षेत्रों व विभिन्न परिदृश्यों में स्थित हैं।

जागेश्वर स्थित ज्योतिर्लिंग नागेश अर्थात् नागों के राजा के रूप में हैं। निश्चित रूप से शिवलिंग यहाँ नाग से अलंकृत है।

जागेश्वर मंदिर इस परिसर के एक छोर पर पश्चिम मुखी रूप में स्थित है। प्रवेशद्वार के दोनों तरफ द्वारपाल की आदमकद मूर्ति स्थापित है। इन्हें नंदी व स्कंदी कहा जाता है। मंदिर के भीतर, एक मंडप से होते हुए आप गर्भगृह पहुंचते हैं। मार्ग में गणेश, पार्वती जैसे शिव परिवार के सदस्यों की कई मूर्तियाँ स्थापित हैं। प्रत्येक मूर्ति के ऊपर दैनन्दिनी पूजार्चना के संकेत दिखाई पड़ते हैं। भूमि पर एक बड़ा शिवलिंग देखा जा सकता है। मंदिर के पुजारी से आप असली शिवलिंग के दर्शन कराने का अनुरोध कर सकतें हैं। असली शिवलिंग दो पत्थरों की जोड़ी है, एक शिव व दूसरा शक्ति का रूप।
कहा जाता है कि यहाँ का शिवलिंग स्वयंभू अर्थात् धरती के गर्भ से स्वयं प्रकट हुआ है। इस शिवलिंग के नीचे शायद पानी का कोई जीवित स्त्रोत मौजूद है क्योंकि यहाँ से पानी के बुलबुले निकलते दिखाई पड़ते हैं।

महामृत्युंजय महादेव मंदिर –

जागेश्वर मंदिर परिसर का सबसे प्राचीन व विशालतम मंदिर है महामृत्युंजय महादेव मंदिर। यह परिसर के बीचोंबीच स्थित है। परिसर में प्रवेश के तुरंत बाद आप इस मंदिर को अपने दायीं तरफ देख सकते हैं।
कहा जाता है कि यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में शिवपूजन की परंपरा सर्वप्रथम आरम्भ हुई थी। यहाँ के पुजारी जी आपको पाषाणी लिंग के ऊपर खुदी शिव की तीसरी आँख अवश्य दिखाएँगे। इस महामृत्युंजय महादेव मंदिर का शिवलिंग अति विशाल है और इसकी दीवारों पर महामृत्युंजय मन्त्र बड़े बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है। पुरातत्ववेत्ताओं ने दीवारों पर २५ अभिलेखों की खोज की जो ७ वीं. से १० वी. ई. की बतायी जाती है। अभिलेख संस्कृत व ब्राह्मी भाषा में लिखे गए हैं। मंदिर के शिखर पर लगी पाषाणी पट्टिका पर एक राजसी दम्पति द्वारा लाकुलीश की पूजा अर्चना प्रदर्शित है। इसके ऊपर भगवान् शिव के तीन मुखाकृतियों की शिल्पकारी की गयी है।
अन्य भारतीय प्राचीन मंदिरों की तरह यहाँ की पाषाणी दीवारों पर भी शुभमंगल व समृद्धि के संकेत खुदे हुए हैं। इन्हें देख अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे पुरातन मंदिरों की रचना कैसे होती थी।

पुष्टि देवी मंदिर –

यह मंदिर परिसर के दाहिनी ओर अंतिम छोर पर, महामृत्युंजय महादेव मंदिर के पीछे स्थित है। यह अपेक्षाकृत छोटा मंदिर है। इसमें एक छोटा गलियारा है जिस पर तिरछी स्लेट की पट्टियों की छत है। यह एक ठेठ हिमालयी छत है। इस मंदिर के भीतर पुष्टि भगवती माँ की मूर्ति स्थापित है।

नवग्रह मंदिर-

यह ९ मंदिरों का एक समूह है जो समर्पित है हिन्दू ब्रम्हांड शास्त्र के ९ ग्रहों को। इस मंदिर समूह में सूर्य भगवान्, शनि भगवान् आदि के मंदिर शामिल हैं।

केदारेश्वर शिवलिंग-

उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में स्थित केदारनाथ मंदिर भी एक ज्योतिर्लिंग है। केदारनाथ मंदिर में शिवलिंग एक अनियमित पत्थर के आकार की है। उसी तरह का शिवलिंग जागेश्वर धाम के केदारेश्वर मंदिर में भी है।

लकुलीश (शिव के अवतार)

लकुलीश भगवान् शिव के २८वें अवतार माने जाते हैं। कुछ लोग इन्हें एक स्वतंत्र पंथ भी मानते हैं। उत्तराखंड व गुजरात में भगवान् शिव के लकुलीश अवतार की अराधना की जाती है। इस अवतार में भगवान् शिव के हाथ में एक छड़ी दिखाई देती है। जागेश्वर धाम में भगवान् शिव के इस अवतार को दर्शाती शिलाखंडें कई मंदिरों के दीवारों पर लगीं हैं।

तान्डेश्वर मंदिर (नृत्य मुद्रा में शिव) -

लकुलीश मंदिर के बगल में एक और छोटा मंदिर है जिसके भीतर भी शिवलिंग स्थापित है। इसके अग्रभाग के शिलाखंडों पर तांडव नृत्य करते शिव की प्रतिमाएं हैं।

बटुक भैरव मंदिर:

यह मंदिर परिसर के बांयी ओर स्थित पहला मंदिर है। मंदिर के प्रवेशद्वार से भीतर जाने से पूर्व यह मंदिर स्थित है। यह भैरवनाथ का मंदिर है।

कुबेर मंदिर – जागेश्वर

कुबेर मंदिर परिसर एक पहाड़ी के ऊपर उस नदी के पार स्थित है जो जागेश्वर मंदिर परिसर के चारों ओर बहती है। यहाँ से जागेश्वर मंदिर परिसर का शीर्ष दृश्य दिखाई पड़ता है। अन्य मंदिरों की तरह, कुबेर मंदिर के भीतर भी मुख्य देव के रूप में शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर के प्रवेशद्वार के ऊपर लगे शिलाखण्ड पर कुबेर की प्रतिमा गड़ी हुई है।

कुबेर मंदिर के पास एक छोटा सा चंडिका मंदिर है जिसके भीतर भी मुख्य देवता के रूप में शिवलिंग स्थापित है।

दंडेश्वर मंदिर-

दंडेश्वर मंदिर परिसर मुख्य जागेश्वर मंदिर परिसर से करीब १ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ एक बड़ा मंदिर व १४ अधीनस्थ मंदिर हैं। वस्तुतः यही बड़ा मंदिर दंडेश्वर मंदिर है और इस क्षेत्र का सबसे ऊंचा और विशालतम मंदिर है। इन मंदिरों में कुछ, दंडेश्वर मंदिर के समीप ही एक चबूतरे पर स्थित हैं व कुछ इसके आसपास बिखरे हुए हैं। इनमें कुछ मंदिरों के भीतर सादे शिवलिंग, योनि पर स्थापित हैं वहीं कुछ मंदिरों के भीतर चतुर्मुखलिंग स्थापित है।

भगवान् शिव यहाँ लिंग रुपी ना होते हुए, शिला के रूप में हैं।

हर हर महादेव 🙏🙏🙏